पैर_और_पाज़ेब (कथा)
पैर और पाज़ेब (कथा)
सेठ श्यामलदास प्रयागराज के रहीस लोगों के से एक हैं, किंतु पैसों का रौब उन्हें छूकर भी न था।
वर्षों पहले सेठ की इकलौती बेटी ३ वर्ष की वय में ननिहाल रणकपुर के मेले मे खो गई थी, और उसकी मनोवेदना में उनकी पत्नी भी चल बसीं।
आज लगभग एक दशक बाद प्रयागराज के मीरगंज की हवेली में जश्न का माहौल था। और माहौल हो भी क्यों न....?
आज सेठ श्यामलदास के इकलौते दत्तक पुत्र #किशोर का २१वां जन्मदिवस जो था। हवेली के बीचों बीच एक ऊंचे चबूतरे पर कुछ नर्तकियों के पैर ठोलक और तबले की थापों को चुनौती दे रहे थे।
देखने वालों की भीड़ कम न था, वर्ग के हिसाब से बैठक व्यवस्था बढ़ते क्रम से सजाई गई थी। पूरा आंगन खचाखच भरा हुआ था।
अचानक दरबान हाज़िर हुआ, " मालिक! कोठी से संदेशा आया है, ख़ास आपके लिए।"
एक बड़े रेशमी रुमाल से खत अलग करते हुए सेठ की आंखों ने बिना खत पढ़े ही लिफाफा देखकर उसका मजनून समझ लिया था, किंतु आत्मबोध के लिए उसे पढ़ना शुरू किया , जिस पर संस्कृत के पुट में एक पंक्ति लिखी हुई थी-
" अद्यांद्यंतोपरांतमत्रिदमावेशषम भविष्यति!"
इसे पढ़कर सेठ के मुख मलिन हो गया, सेठ का मन चेतना शून्य देह को छोड़ कुछ पल के लिए अतरंग विचरण में चला गया।
सहसा भादौं की बदरी की तितर बितर कर देने वाली किसी बिजली के मानिंद सेठ के आंगन की भीड़ को चीरती हुई पूरे मीरगंज की सबसे खूबसूरत रकासा सेठ की हवेली के बीचों बीच बने नील कमल के ठीक ऊपर जाकर थम गई।
पूरे शामियाने में इतनी खामोशी, उससे पहले कभी न थी। अपलक दृष्टि से निहारते लोग उसकी रूप माधुरी में ऐसे सुध बुध खोए मानों चकोर ने अमावस के दिन पूनम का चांद देख लिया हो।
सेठ के हठन्योत पर आज़ #पद्मिनी उनकी देहरी पर अपने सम्पूर्ण जीवनकाल का शायद पहला नृत्य प्रस्तुत करने जा रही थी।
वह आजतक कोठे पर रहकर भी स्पर्श रहित और अप्रस्तुत रही, फिर भी लोग उसे रकासा ही कहते थे।
धीरे धीरे महफ़िल परवान चढ़ी और विलंबित कहरवा के सुरों की संगत करते पद्मिनी के पैरों की थाप और उसके पाज़ेब का एक एक स्वर बिल्कुल किसी नदी के कल कल झरने की भांति समाधि में जाता सा प्रतीत हो रहा था।
ठीक सामने पालने पर बैठे पिता पुत्र इस महफ़िल का आनंद ले रहे थे, सेठ ने अपने पुत्र को आज उसकी इच्छा का उपहार भेंटने का वचन दिया है।
किशोर, " आप अपना पूरा तो करेंगे न?"
"अवश्य बेटे! सब तुम्हारा ही तो है। जो जी में आए ले लो, मुझसे मांगना कैसा?" आपने लाडले का मस्तक चूमते हुए सेठ ने बड़े गर्व से ये बोल कहे।
पिता के मुख से आश्वासन भरे गर्वीले शब्द सुनते ही किशोर ने पद्मिनी की तरफ़ इशारा किया।
सेठ ने पुत्र को समझाने की अनंत कोशिश की, किंतु वचनबद्धता और पुत्रमोह ने सेठ को मतिमूढ़ कर दिया।
इधर पद्मिनी पिता पुत्र के मध्य वार्तालाप को उनके आभामंडल की धूमिलता से और चेहरों के भाव परिवर्तन से समझ चुकी थी।
अतः उसने नृत्य जारी रखा और शाम का इंतजार करती रही।
सुबह से शाम होने को आई, दर्शकों की संख्या दालान के एक एक इकाई पर भारी थी।
उधर अस्ताचल सूर्य क्षितिज में अपनी लालिम बिखेर रहा था, इधर सेठ श्यामलदास की हवेली के आंगन में मखमली कालीन पर एक एक करके घुंघरू बिखरने शुरू हो चुके थे।
सूर्य की अंतिम किरण के अस्त होते ही किशोर पालने से उठा और पद्मिनी की ओर बढ़ा, उसे यह अनिष्ट करने से रोकने के लिए सेठ भी पीछे भागे।
इधर दिनभर की उमंग में डूब चुके हाथों से ढोलक और तबले की थाप टूटी और उधर विसर्जन की मुद्रा में अपने दोनो घुटनों से भूमि का स्पर्श करते हुए, अधो प्रणाम की मुद्रा में अपने दोनो हाथों के मध्य सिर छिपाए, पद्मिनी नतमस्तक थी। उसके दोनो पैरों के पाजेबों में एक एक घुंघरू ही शेष बचे थे।
किशोर ने आगे बढ़कर जैसे ही पद्मिनी को अपनी बाहों में उठाना चाहा, पद्मिनी के दाहिने पैर में शेष एक मात्र घुंघरू भी छिटक कर सेठ के हाथों में आ गिरा।
सेठ की नज़र उसके दाहिने पैर के तलवे पर बने पद्म पर पड़ी, यह वही पद्म था जिसे सेठ सेठानी ने बेटी के जन्म के उपरांत बनवाया था।
सेठ श्यामलदास धरती पर थे, और कुछ पकड़ना चाह रहे थे, कुछ खोज रहे थे किंतु शायद सबकुछ धूमिल हो चुका था, सिवाय उस एकमात्र घुंघरू वाले पाज़ेब के।
आज़ पद्मिनी तो सम्मुख थी
किंतु अनंत समाधि में विलीन हो चुकी थी।
@ Vikram Mishra
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