श्रृंगार-मुक्तक
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"कितनी आह सहेजी होंगी, कितना तुम रोते होगे...?
ऐ चाँद रोज की टूटन में तुम कैसे
सब ढोते होगे..?
मैं एक रात की टूटन में युग युग
जितना घुट जाता हूँ,
तुम रोज रोज की तड़पन में कैसे
चितवन धोते होंगे..?"
मशहूर हुए तेरे
नगमे मशहूर हुआ मेरा गाना,
मशहूर हुआ हम दोनों का
यूँ छिप छिप कऱ आना जाना,
मशहूर हुई हम दोनों की
यह घुली मिली सी उमर सनम
मशहूर हुआ मेरे कंधे
पर तेरा, सर रख कर सो
जाना......
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वो मुझे देखकर मुस्कुराती रही , मैँ उसे देखकर मुस्कुराता रहा.........!!!
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बड़ी दूर का आया शहरी, मंदिर मस्जिद क्या जाने।
जो बूँद बूँद में सिमटा हो,वह दरिया बनना क्या जाने।
तुम खोये खोये रहते हो, हम बिखरे बिखरे रहते हैं।
तुम हमे मनाना क्या जानो, हम तुम्हे मनाना क्या जाने।
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सिहरन
की इस नयी फिजा में,आज मनाई फिर से यारी...।
उसने
अपनी झिझक छोड़ दी,
मैंने
अपनी दुनियादारी।।
टूट
गया सिलसिला तभी से निपट अकेली तन्हाई का।
उसने
देखा चाँद रात भर,
मैंने उसकी मूरत प्यारी।।
"रंग की पाकीजगी और रूह का अपना तराना ;
मंदिरोँ की घण्टियाँ और मस्जिदोँ मेँ
सिर झुकाना।
आह! मुफलिस के गुलिस्ताँ मेँ रंगोँ की
पारसाई,
और अनहद फागनोँ के बीच घुलकर फाग
गाना।"
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"होली के ये रंग निराले, तिस पर एक निराला मैं।
अज़ब प्रेम की बृजबाला
वह, गज़ब ढंग मतवाला मैं।
एक अधूरी वह मेरे बिन, उसके बिन पनघट सूना,
पनघट की इस ख़ामोशी में
रंग उड़ाता ग्वाला मैं।।"
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कई मंज़र जमाने ने दिखाए
चाँद से बेहतर...
मग़र ख़ुद चाँद का दीदार ही कुछ और होता है।
दिखे क़ोई ख़ूबसूरत तो नवाज़िश , चाँद
सा कह दें
खिले इस चाँद में यूँ साथ चलना और होता है।
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लिखी इबारत आज, आज ही नज़र मिली।
परदेसी आने वाले हैं
खबर मिली।
कुछ पन्नों ने महसूस
किये अरमान मेरे।
मैं उसमे और वह मुझमे
कुछ इस कदर मिली।
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जो ये इबादत
शुरू हुई है,खुद के घर से,तो क्या बुरा है..?
अग़र इबादत में में
हाँथ जुड़ते है उसके दर पर, तो क्या बुरा है...?
जो यह मोहब्बत नहीँ
समझती,ये तेरा मज़हब, ये मेरा मज़हब।
तेरी दुआएँ मेरी
हिफ़ाजत की इल्तज़ा है,तो क्या बुरा है??
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इक शाम होकर के
गई, इक शाम अब होने को है।
परिंदे रुक अभी तेरी
मेरी उड़ान होने को है।
अभी तो नींद टूटी है, अभी सपने नही देखे।
तू थोडा देख अगली ही
गली में, मेरा मकान होने
को है।
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मंदिर-मंदिर, मस्जिद-मस्ज़िद, गली-गली के हर नज़राने..
अमलताश के कोमल पत्ते, सावन के गुमनाम तराने...
चीख चीख कर पूंछ रहे
सब अपने अपने गलियारे से..
आज अकेले तुम आये हो, कहाँ गए वो यार पुराने...???
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चलो फिर से मोहब्बत का कोई किस्सा नया गढ़ लें,
उमर की इस तरक्की में नई कुछ
सीढियां चढ़ लें।
कभी दो चार हो जाएंगी आंखें इस
घड़ी में ही,
जरा सा तुम हमे पढ़ लो, जरा सा हम तुम्हे पढ़ लें।
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*वो
मुझसे रूठकर भी मुझमे आकर डूब जाती है*,
*मैं उसकी हर नुमाइश में तराने खोज लेता हूँ*।
*ये उसकी चाहतों का ही असर तो है कि मैं अब भी*,
*स्वयं को हार जाता हूँ, उसे भी जीत लेता हूँ*
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मोहब्बत कर ली हमने इस
कदर कुछ याद न आया,
कहीं डूबे कहीं निकले , मगर कुछ हाँथ न आया।
किताबों में दबी हैं आज भी वो सूरतें अपनी
वो मेरी नींद में आई , मैं उसके ख्वाब में आया।
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"काफिरों के
काफ़िले थमते नहीं साहेब,
जहाँ पर रात ढल जाये, वही घर-बार होता है।
हमे क्या वास्ता इस दौर से, उस शामियाने से,
हमारा हर कदम रखना महज़ इक बार होता है।।"
जहाँ पर रात ढल जाये, वही घर-बार होता है।
हमे क्या वास्ता इस दौर से, उस शामियाने से,
हमारा हर कदम रखना महज़ इक बार होता है।।"
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सुर्ख़
आँखें बता रही है,ये कोई गम है या हम नही हैं।
तुम
अधूरे हो इस जहाँ में, गुरूर
है, कोई सितम नही है।
जो
तुम वफ़ाओं के दरमियाँ इस क़दर हमी से गिला न करते।
तो
इन दुआओं में तुम भी होते, ये
सत्य है कोई वहम नही है।।
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जो
हारा वो हरा हो गया, इश्क़ मुकम्मल जीत गया।
जो
जीत गया इस हार जीत में , समझो
उसका मीत गया।।
फ़िर
क्या सौदा करना फ़रेब से , झूठों
से , गद्दारों से।
मैंने
तो महफ़िल लूट लिया,
सपनों
में जमाना बीत गया।
एक
अरसे से झुकी निगाहें, बचपन
का रुख खोज रही हैं।
कुछ
खेतों में दबी हुई हैं, अफसानों
में रोज रही हैं।
जमघट
की इस अजब जंग ने कई निवाले छीन लिए हैं।
एक
अकेले का घर है ,
लाखों
के सर अफरोज नही हैं।
इम्तिहानों
के झरोखे हमपे तुमपे ही पड़े हैं।
धूप
में तुम भी खड़े हो ,
धूप
में हम भी खड़े है।
अब
तो कह दो इस जहाँ से कुछ नही बाकी रहा...
इक
झलक पाने की जिद में, तुम
अड़े हो हम अड़े हैं।।
हम
बंजारों का यह हुजूम, हरफनमौला
मदमाता सा।
जो
सम्हल जाये वह बहक गया, जो
बहक जाये गमखाता सा।।
इस
दोज़ख में क्या रखा है, साहब
कुछ अफ़साने लिख लो।
मैं
ठहर जाऊं तो झीलों सा , सैलाब
बनूँ हर्षाता सा।।
ये
ज़ालिम दिल के जाले न जलाये जले।
तुम
जहां से चले , हम जहाँ को चले।
रह
गए है अधूरे अधूरे अधर,
इस
उमर में न जाने कहाँ को चले।
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जो
कैद हैं अब तक निगाहों में तराने, अल्फाज
सही इश्क़ लड़ाने के लिए आ।
मैं
तल्ख सुख़न प्यास तू दरिया-ए-ख़ाब सा,
शामिल
है अगर मुझमे , जिलाने के लिए आ।
जो
लुट चुकी है जिंदगी की शान-ए-इबादत।
मुझमे
मेरी हस्ती तू बसाने के लिए आ।
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इतर
होकर अँधेरा, रौशनी का ताज क्या जाने...??
परिंदे
खुद परों को खोलने का राज क्या जाने...??
अग़र
है हर कदम पर हर गली पर एक अफ़साना.,,,
लुटा
है जो कलों की शर्त पर, वह
आज क्या जाने...??
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मुफ्लिसों
की रंजिशें,और राजदारों का घराना।
मुफ़लिसों के ही चरागों से सजेगा शामियाना।।
महफ़िल-ए-आगोश में सब तरबतर होंगे मग़र,
कबतलक बिछड़ा रहेगा मज़हबी-उल-सनम-खाना।
रात
गुजरी तो लगा एक जमाना गुजरा,
नयी
गली से कोई साज सुहाना गुजरा।
ख़्वाब
के संग ढली रात अमावस वाली,
चाँद
निकला तो लगा कोई पुराना गुजरा।
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आबोहवा
में ढंग की मोहलत नहीं रही।
महफूज़
कलाई ,कोई संगत नही रही।
मै
ज़र्द खिलौने की तरह देखता रहा,
इंसान
में इंसान की रंगत नहीं रही।
आसान
नहीं मेरी मंजिल,
आसान
नहीं मुड़कर चलना।
आसान
नही यूँ दीप बुझा अनजानी राहों पर चलना।।
यह
सहज़ ख़िलाफ़त आज नही तो कल यह कीमत ले लेगी...
आसान
नहीं यूँ संग संग दीपक के मानिंद जला करना।।
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होली
के ये रंग निराले,
तिस
पर एक निराला मैं।
अज़ब
प्रेम बृजबाला वह,
गज़ब
ढंग मतवाला मैं।
एक
अधूरी वह मेरे बिन,
उसके
बिन पनघट सूना,
पनघट
की इस ख़ामोशी में रंग उड़ाता ग्वाला मैं।।
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सारे
फ़ाग सुने हैं जिसने,
फिर
भी फ़ागुन खाली है।
कितने
रंग भरे है उसने,
ख़ुद
का रंग सवाली है।
इस
होली में एक रंग उस दामन में भी रंग मौला,
जिस
झोली में न होली है,
न
दीपों की दीवाली है।।
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अखबारों
में सुर्ख़ हुए तुम,
पहली
जद पर आ बैठे।
पर
भूल गए तुम अधरों से मेरे नग़मे भी गा बैठे।।
वो
बात अलग है इस सावन बरसात हमारे घर न हुई,
अनजान
सही पर फ़ागुन में तुम फ़ाग हमी संग गा बैठे।।
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"इश्क़
इबारत संग चिठ्ठी में,मेहँदी
का रंग महक गया,
कोरा
कागज़ तक बचा नहीं,वह जाम सलीके छलक गया।
फिर
जो उस पर तस्वीर छुपाकर लिखा गया था चुपके से,
वह
लिखते लिखते थकी नहीं, मै
पढ़ते पढ़ते बहक गया।"
नज़र
में कोई नजराना नही आया तेरे काबिल।
जिधर
मैं रुख़ बदलता हूँ,
हवा
भी बदल जाती है।
ये
तेरा खौफ़ है या मेरे रुतबे का तकाजा है,
नज़र
फिसली तो तुझपर ठहरते ही संभल जाती है।
कश्ती
जो इक़बार न डूबे ,इश्क़ मुकम्मल कैसे हो?
मझधारों
में माझी की पतवार में सम्बल कैसे हो?
तैर
चले तो साथ अधूरा रह जाएगा साथी का..
डूब
चले तो आँखों का सैलाब,समन्दर
कैसे हो??
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जिंदगानी
हर कदम पर जंग है,कारीगरी है।
हर
तरफ़ अठखेलियाँ हैं,
रूप
की जादूगरी है।
कब
तलक ख़ुद को रखोगे,
इस
क़दर महफूज़ तुम,
लुट
गए तो इल्म होगा, बचना खुद्दारी नही है।
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मै
अपनी सादगी में हूँ,वो अपनी वादियों में है।
मेरा
महबूब भी जिल्-ए-इलाही सुर्खियों में हैं।
कोई
शिकवा नही ख़ुद से,
खुदा
से रंजिशें कैसी..?
वो
अपनी माँ का जाया है, उसी
की लोरियों में है।
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चली
अचानक पुरवाई, बह गए मेरे ताने बाने।
मैं
अधरों के अधरावन में, फ़ीके
थे सब ये शहराने।
शहतीरों
से भी शातिर निकली शोर मचाती पायलिया,
इस
छन छन क़ी तरुणाई में, मैं
भूल गया सारे गाने।
वो
सारे मंजर तब्दीली के , मेरी
निगाहें अगवा हैं।
मैं
इस पथ पर यूँ इतर चला हूँ, सारी
राहें संगवा हैं।
हो
नियति-प्रभा से परे सतत, मैं
ऐसा दीप जलाऊंगा।
जिसकी
आभा चिरकाल कहेगी,
सारे
अक्षर भगवा हैं।
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ये
जालसाजी है क़ि तरन्नुम में तेरी दस्तक अभी नही है।
मेरी
वफ़ा के ये शामियाने भी सुर्ख़ियों में अभी नही है।
मग़र
कभी तो यकीन होगा क़ि जो सबेरा कभी हुआ था,
वो
ताब सूरज में न कभी था, वो
आग सूरज में भी नही है।
आज
मुंडेरों की चौखट पर, यह
बयार किस ओर चलेगी।
या
तो साथ गुजरिया देगी, या
पतंग चहुँ ओर फिरेगी।
नज़रों
के बेख़ौफ़ तराने,भी उलझन में फंस जाएंगे।
जिसके
संग चलेगा माझी,बस उसकी ही डोर चलेगी।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
कोई
आवाज दे न दे, मेरी अपनी ही महफ़िल है।
मैं
अपने ही घरौंधे से नए नित साज गढ़ता हूँ।
मैं
जुगनू हूँ किसी के खुशनुमा उस आशियाने का।
चमकता
हूँ जहाँ हर रोज मै आगाज करता हूँ।
सारी
महफ़िल खाली खाली,
एक
बिना पनघट सूना।
दिनभर
की बदहाली तिस पर यह तेरा घूँघट सूना।
कोई
आहट , कहने को आतुर है दूर बसेरे से,
बस्ती
है बड़ी दूर मग़र यह डगर लगे जमघट दूना।
झुके
सर क्या जताएंगे क़िसी की रंजिशें साहब।
कई
गुजरे हुए लम्हें भी अब ख़्वाबों में रुकते हैं।
जो
तारे तोड़ लाने की दलीलें पेश करते थे।
जफ़ा
के इस भरे अखबार में हर रोज झुकते हैं।
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कुछ
हवाओं से इतर बहना जरूरी है,
रहो
तुम ख़्वाब में तब भी सही ,रहना
जरूरी है।
ये
आँखें सुर्ख़ हों या सुर्खियाँ नजदीकियों की हों।
मेरा,कमख़ाब सा गढ़ना, तेरा पढ़ना जरूरी गई।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
ज़िन्दगी
इस उम्र के आगे नही झुकती,
सितम के दायरों में जिस्म ये दम तोड़ देता है।
शुक्र
है उस इलाही की नवाज़िश का जो रहबर है,
ये
दिल ही है जो अब हर दौर में दिल जोड़ देता है।
लिखी
इबारत आज, आज ही नज़र मिली।
परदेसी
आने वाले हैं खबर मिली।
कुछ
पन्नों ने महसूस किये अरमान मेरे।
मैं
उसमे और वह मुझमे कुछ इस कदर मिली।
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जो
ये इबादत शुरू हुई है,खुद
के घर से,तो क्या बुरा है..?
अग़र
इबादत में में हाँथ जुड़ते है उसके दर पर, तो क्या बुरा है...?
जो
यह मोहब्बत नहीँ समझती,ये
तेरा मज़हब, ये मेरा मज़हब।
तेरी
दुआएँ मेरी हिफ़ाजत की इल्तज़ा है,तो
क्या बुरा है??
ओढ़कर
चादर फ़क़ीरी की, खुदा के रंग की।
मेरे
घरौंदे के ओ!सूरज क्यों जमीं पर खो गए।
इल्म
है इस बात का दो गज मयस्सर न हुआ।
तुम
जहां पर गिर पड़े,
फिर
क्यों वहीँ पर सो गए।।
अरमानों
के सब मनभावन तेरे हों।
अफसानों
के ढेर अपावन मेरे हों।
जो
तुम्हें तुम्हारे फ़लक तलक महफूज रखे,
मेरे
हिस्से की सारे सावन तेरे हों।।
वक्त
की रेत पर, जिंदगी का सफ़र, एक अधूरी कड़ी में वो थम सा गया।
कोई
सौदा हुआ इस कदर उस घड़ी, मैं
बिका पर, रक़म थोड़ी कम सा गया।।
मैंने
सपने तजे, मैंने अपने तजे, एक सिक्के की कीमत भी कम न हुई।
मैं
ठगा रह गया, मैं खड़ा रहा गया, जैसे पुतला कोई मोम का जम गया।।
ऐ
चाँद आज तू दस्तक दे, उस
घर की मौन मुंडेरों पर।
जिन
घर का सूरज अस्त हुआ है, सरहद
पर , हम
औरों पर।
ऐ
चाँद जरा तू ठहर ठहर हर उस घर को चमका देना।
जिस
घर मेहँदी-रंग फीका हो, बस विरह भरी हो अधरों पर।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
शुरू
हुआ इस धूप बहाने चोरी चोरी ज़ुल्फ़ हिलाना।
मेरी
नींद से पलकें खुलना, और
तेरा छत पर आ जाना।
अभी
नही भूला मैं जिसको,
कभी
नहीं झुठला पाउँगा,
मखमल
पर बदहाली जीना,
काँधे
पर सर रख सो जाना।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
इस
जगती के उल्लास भरे सारे पल, सारी
उत्कण्ठा स्नेह जिंदगी जीने की।
मुस्तैद
जहाँ के सभी तराने ड्योढ़ी पर, फरियादी
हो खुद प्रियंवदा संग जीने की।
तुम
बनो रात की अटल चाँदनी पूनम सी, दिन
के दिनकर की किरणों के मानिंद चलो,
मैं
#वीर सूर्य सा उन्मुख हो उद्दीप्त रहूं, तुम अमराई घनघोर घटाएं पीने की।
इक
तो अल्हड़ उम्र गुजरिया, तिस
पर यौवन की बरसात।
अल्हड़पन
अठखेली करता ,गुजर गए कितने दिन रात।
आज
रात फिर कदम रखेगी,
तिथि
जवानी की देहली पर,
जिसके
हाथ लगेगी मूरत,
उसकी
ही होगी बारात।।
एक
कमख़ाब से ढाले गए हैं, नजराने
मेरे।
किसी
आफ़ताब की लहरों से तर है जमाने मेरे।
ये
रेशम जिस घड़ी डाला गया था हलक पर मेरे,
उसी
की याद में बस तर बतर हैं गीत गाने मेरे।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
रंगरेजवा
ने चादर रंग दी,
रूह
मेरी कोरी छोड़ी।
नेग
में ले गयो वारी उमरिया,पर
चितवन गोरी छोड़ी।
अपने
ही रंग में रंग लेता तो तेरा क्या हो जाता।
उन
सोलह हजार वर लीन्ही, एक
मुझे #प्यारी छोड़ी।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
इक
इंसा ही इस दुनिया क़ी हर जात समझता है।
जो
भीतर है वह भीतर की हर बात समझता है।
हद
तो कर दी है इस जहान के आका और लुटेरों ने।
वरना
पंक्षी भी उड़ने की औकात समझता है।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
एक
समन्दर में हर दरिया बहता रहता है।
और
जमीं से फलक तलक वह कहता रहता है।
जब मुझमें
इन धाराओं का ही जल अबतक भरा हुआ है,
क्यों
फिर इंसा मुझे नमक सा कहता रहता है।
आज
फिर लहरें उठेंगी,
उस
समंदर पार से।
आज
फिर कश्ती लड़ेगी धार से, मझधार
से।
रोज
के ये सिलसिले हैं,
रोज
की कारीगरी है।
क्या
भरोसा कब कौन आ जाये नजर के पार से।।
कई
सजदे किये मैंने उसे अपना बनाने के।
सितम
ने अबतलक उन दामनो का साथ न छोड़ा।
मैं
बिखरा हूँ समय की रेत पर कुछ इस तरह मालिक,
जरा
सी आह ने मुझको हर एक मझधार में छोड़ा।
खिल
गया चाँद, उनकी निगाहें मिली, शाम रुखसत हुई इक अलग नूर में।
जो
बहक से गए थे ये अल्हड़ क़दम, जा
के थम से गए उनके दस्तूर में।
कुछ
फ़ना से हुए आज फिर ये सितम, कुछ
नवाबी अदाओं में लुट से गए,
हम
जहां पर खड़े थे खड़े रह गए, इस
नजर के अजब चश्म-ए-बद्दूर में।।
कुछ
तो हम तन्हाइयों की जालसाजी में फंसे थे।
कुछ
लबों की #सुर्खियाँ हमसे #बयाँ होने को हैं।।
कम #कहर बरसा रहे थे इस जहां के #हुस्न वाले।
जो
सदी की तारीखें भी अब #जवाँ
होने को हैं।।
इलाही
इश्क़ के आगोश में सब डूब जाता है।
नज़रें
कैद होतीं है मजा भी खूब आता है।
मग़र
जिस पल मयस्सर दिल्लगी रुसवा की होती है।
भरे
सैलाब में भी बस नजर महबूब आता है।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
अरमानों
की बस्ती हो, नजरानों की जागीर मिले।
शोहरत
की एक नुमाइश हो,
अल्फाजों
की शमशीर मिले।
कुछ
मिले कभी न मिले मग़र बस एक अता करना मालिक,
मैं
जिन राहों पर निकल पडूँ, बस
अमन मिले, न पीर मिले।
वही
पुराने गलियारे हैं,
वही
पुरानी है सौग़ात।
वही
शाम का सूनापन है,
बिन
मौसम की है बरसात।
कैसे
खुद को और सहेजूँ,
कैसे
खुद को झुठलाऊँ?
वही
याद की ख़ामोशी है,
वही
फ़रेबी हैं हालात।
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