अलग चादर बना मौला जिसे दरगाह पर तेरी, चढ़ाऊँ मै तो अस्मत मुल्क की महफ़ूज़ हो जाये........ (ग़ज़ल)
ग़ज़ल जुनूँ-ए-रंजिशें अबतक हमें सरहीन करती हैं, चलो गुमनामियों का ही सही, इक दौर हो जाये। उन्हें कैसे करें रुख़सत, जिन्हें नाजों से पाला है, मुसलसल दाव पर है सब, पता क्या औऱ हो जाये।। हमारे घर की दीवारों पे छत ऊंची बहुत है पर, हमारे सर अभी टकरा रहे हैं ग़ौर हो जाये।। अमां में शोर है इज्जत किसी की हासिये पर है, हुआ है आज ऐसा क्या पता हर रोज हो जाये। न मन्दिर काम आयी है, न मस्जिद काम आया है, मशक्कत कर रहा हूँ, मैकदे में ख़ोज हो जाये। मुअक्किल हैं बहुत जिनके सभी घर-बार गिरवी हैं, उम्मीद-ए-पुख़्तगी है , न्याय का कोई रोज़ हो जाये।। अलग चादर बना मौला जिसे दरगाह पर तेरी, चढ़ाऊँ मै तो अस्मत मुल्क की महफ़ूज़ हो जाये।।