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पैर_और_पाज़ेब (कथा)

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                                             पैर और पाज़ेब (कथा)          सेठ श्यामलदास प्रयागराज के रहीस लोगों के से एक हैं, किंतु पैसों का रौब उन्हें छूकर भी न था।    वर्षों पहले सेठ की इकलौती बेटी ३ वर्ष की वय में ननिहाल रणकपुर के मेले मे खो गई थी, और उसकी मनोवेदना में उनकी पत्नी भी चल बसीं।      आज लगभग एक दशक बाद प्रयागराज के मीरगंज की हवेली में जश्न का माहौल था। और माहौल हो भी क्यों न....?        आज सेठ श्यामलदास के इकलौते दत्तक पुत्र #किशोर का २१वां जन्मदिवस जो था। हवेली के बीचों बीच एक ऊंचे चबूतरे पर कुछ नर्तकियों के पैर ठोलक और तबले की थापों को चुनौती दे रहे थे।            देखने वालों की भीड़ कम न था, वर्ग के हिसाब से बैठक व्यवस्था बढ़ते क्रम से सजाई गई थी। पूरा आंगन खचाखच भरा हुआ था।       अचानक दरबान हाज़िर हुआ, " मालिक! कोठी से संदेशा आया है, ख...

शिक्षित बनें...साक्षर नहीं.........

                                                     आज़ादी के बाद से आज़तक हम अपनी भाषा-शैली को बदलते आये औऱ भाषा शैली की जगह हमारी भाषा ही बदल गयी। औऱ भाषा के बदलते ही हमारी संस्कृति में विकृतियाँ जन्म लेने लगीं। आज सभ्यताओं के जिन दायरों में हम अंग्रेजी को स्थान दे रहे हैं, वह हमारी मातृभाषा हिंदी के लिए ही उचित है, अन्य किसी भाषा के लिए नहीं। उद्देश्य किसी भाषा-विशेष का अपमान करना नहीं है, क्षेत्र-विशेष में भाषा का अपना महत्व है, अपना वर्चस्व है, अग़र भाषा-वाद अलगाववाद का रूप ले ले, तो फ़िर क्या कहेंगे आप इसे। *अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर की पढ़ाई में प्रवेश लेते समय हमारे महनीय प्राध्यापक महोदय जी ने मुझसे दूसरा प्रश्न यही किया था, आपका उद्देश्य सिविल सेवा है फ़िर आप साहित्य क्यों पढ़ना चाहता है? यहां मेरी अभिव्यक्ति का अंदाज कुछ नरम है, तत्कालीन समय मे आदरणीय राय सर ने जिस चुटीले अंदाज में मुझसे प्रश्न किया था, वह किसी कुठाराघात से कम नहीं था , क...

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  " है उदासी आज सूरज के नयन में, औऱ धरती पर अंधेरा झूमता है। जा रहा हूँ मैं तिलिस्मी दीप लेकर, कोहरा मेरे बदन को चूमता है। ओश मुझपर मोतियाँ बरसा रही है, शीत है कि कर कुतरना चाहती है। मैं अकिंचन धीरे- धीरे बढ़ रहा हूँ, औऱ बयारें पर कतरना चाहती हैं। रास्ते सुनसान बीहड़ बन गए हैं, धुंध अंधाधुंध सब पर छा गयी है। मैं अकेला बिन उजाले चल रहा हूँ औऱ धरती मेरे हिस्से आ गयी है। स्याह होकर दिन मुझे ललकारता है, जुगनुओं ने मुझसे बावस्ता किया है। रास्तों को भी किनारे ओट ऱखकर, आज धरती ने मुझे रस्ता दिया है।" # विक्रम मिश्रा

पल्लवन

  #पल्लवन #भावनाओं_के_अनन्त_आकाश_में_सम्भावनाओं_की_खोज सृष्टि में एक शब्द सर्वत्र व्याप्त है #टूटना। एक अदृश्य प्रलयंकारी शक्ति जिसकी विभीषिका एक नये आयाम की ओर अग्रसर है, के प्रकोप से लगभग त्राहि-त्राहि मची हुई है। कोई परिजनों के महाप्रयाण से शोकाकुल है तो कोई अपनी खण्ड खण्ड होती आजीविका से टूट चुका है। कोई संयोग से टूट रहा है, कोई वियोग से टूट रहा है। मै स्वयं हाल ही में एक अत्यंत विषम परिस्थिति से बाहर आने की कोशिश में हूँ। केंद्र से निकल कर परिधि तक आ चुका हूँ, बस मुक्त होना शेष है। परन्तु अबतक मेरा तज़ुर्बा यह कहता कि टूटना हो, विखण्डन हो, या कैसा भी विरह हो, वह सृजन का एक नवीन आयाम प्रस्तुत करता है। गौरतलब है वृक्ष की एक टहनी के टूट जाने से वृक्ष वीरान नहीं होता, अपितु उसके पादबिन्दु से नयी कोपलें प्रस्फुटित हो जाती है, और एक नया वृक्ष तैयार हो जाता है। गौरतलब है बादलों के संघनन के पश्चात टूटने या विखण्डन की प्रक्रिया से वर्षा के अमृतबिन्दु समस्त धराधाम को तृप्त करते हैं। गौरतलब है कि एक बीज जमीन की गहराइयों में दफ़्न होने के बाद टूटता है, और फिर उससे अंकुरण...

अलग चादर बना मौला जिसे दरगाह पर तेरी, चढ़ाऊँ मै तो अस्मत मुल्क की महफ़ूज़ हो जाये........ (ग़ज़ल)

ग़ज़ल जुनूँ-ए-रंजिशें अबतक हमें सरहीन करती हैं, चलो गुमनामियों का ही सही, इक दौर हो जाये। उन्हें कैसे करें रुख़सत, जिन्हें नाजों से पाला है, मुसलसल दाव पर है सब, पता क्या औऱ हो जाये।। हमारे घर की दीवारों पे छत ऊंची बहुत है पर, हमारे सर अभी टकरा रहे हैं ग़ौर हो जाये।। अमां में शोर है इज्जत किसी की हासिये पर है, हुआ है आज ऐसा क्या पता हर रोज हो जाये। न मन्दिर काम आयी है, न मस्जिद काम आया है, मशक्कत कर रहा हूँ, मैकदे में ख़ोज हो जाये। मुअक्किल हैं बहुत जिनके सभी घर-बार गिरवी हैं, उम्मीद-ए-पुख़्तगी है , न्याय का कोई रोज़ हो जाये।। अलग चादर बना मौला जिसे दरगाह पर तेरी, चढ़ाऊँ मै तो अस्मत मुल्क की महफ़ूज़ हो जाये।।

श्रृंगार-मुक्तक

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 " कितनी आह सहेजी होंगी , कितना तुम रोते होगे... ? ऐ चाँद रोज की टूटन में तुम कैसे सब ढोते होगे.. ? मैं एक रात की टूटन में युग युग जितना घुट जाता हूँ , तुम रोज रोज की तड़पन में कैसे चितवन धोते होंगे.. ?" # वीर 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 मशहूर हुए तेरे नगमे मशहूर हुआ मेरा गाना , मशहूर हुआ हम दोनों का यूँ छिप छिप कऱ आना जाना , मशहूर हुई हम दोनों की यह घुली मिली सी उमर सनम मशहूर हुआ मेरे कंधे पर तेरा , सर रख कर सो जाना...... 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 # मोहब्बत   तो भरी   # महफिल   की इक   # जालिम   # सियासत   है जहाँ तक   # शोर   है वह तो   # महज   इक   # बादशाहत   है # हुकम   का   # दौर   तो अब भी शुरू होता है   # नग्मों   से # कलम   का जोर है   # वह   आज भी मेरी   # अमानत   है।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 # चाँद   सिमटा रहा अपनेँ   # आगोश   मेँ , रात भर   # र...