शिक्षित बनें...साक्षर नहीं.........
आज़ादी के बाद से आज़तक हम अपनी भाषा-शैली को बदलते आये औऱ भाषा शैली की जगह हमारी भाषा ही बदल गयी। औऱ भाषा के बदलते ही हमारी संस्कृति में विकृतियाँ जन्म लेने लगीं। आज सभ्यताओं के जिन दायरों में हम अंग्रेजी को स्थान दे रहे हैं, वह हमारी मातृभाषा हिंदी के लिए ही उचित है, अन्य किसी भाषा के लिए नहीं। उद्देश्य किसी भाषा-विशेष का अपमान करना नहीं है, क्षेत्र-विशेष में भाषा का अपना महत्व है, अपना वर्चस्व है, अग़र भाषा-वाद अलगाववाद का रूप ले ले, तो फ़िर क्या कहेंगे आप इसे। *अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर की पढ़ाई में प्रवेश लेते समय हमारे महनीय प्राध्यापक महोदय जी ने मुझसे दूसरा प्रश्न यही किया था, आपका उद्देश्य सिविल सेवा है फ़िर आप साहित्य क्यों पढ़ना चाहता है? यहां मेरी अभिव्यक्ति का अंदाज कुछ नरम है, तत्कालीन समय मे आदरणीय राय सर ने जिस चुटीले अंदाज में मुझसे प्रश्न किया था, वह किसी कुठाराघात से कम नहीं था , क...