शिक्षित बनें...साक्षर नहीं.........
आज़ादी के बाद से आज़तक हम अपनी भाषा-शैली को बदलते आये औऱ भाषा शैली की जगह हमारी भाषा ही बदल गयी। औऱ भाषा के बदलते ही हमारी संस्कृति में विकृतियाँ जन्म लेने लगीं। आज सभ्यताओं के जिन दायरों में हम अंग्रेजी को स्थान दे रहे हैं, वह हमारी मातृभाषा हिंदी के लिए ही उचित है, अन्य किसी भाषा के लिए नहीं। उद्देश्य किसी भाषा-विशेष का अपमान करना नहीं है, क्षेत्र-विशेष में भाषा का अपना महत्व है, अपना वर्चस्व है, अग़र भाषा-वाद अलगाववाद का रूप ले ले, तो फ़िर क्या कहेंगे आप इसे।
*अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर की पढ़ाई में प्रवेश लेते समय हमारे महनीय प्राध्यापक महोदय जी ने मुझसे दूसरा प्रश्न यही किया था, आपका उद्देश्य सिविल सेवा है फ़िर आप साहित्य क्यों पढ़ना चाहता है? यहां मेरी अभिव्यक्ति का अंदाज कुछ नरम है, तत्कालीन समय मे आदरणीय राय सर ने जिस चुटीले अंदाज में मुझसे प्रश्न किया था, वह किसी कुठाराघात से कम नहीं था , किन्तु सम्भव था कि वह मेरे धैर्य की परीक्षा रही हो। बहरहाल प्रत्युत्तर में मैंने कहा था कि मैं देखना चाहता हूँ कि अंग्रेजी में ऐसा क्या है जो मेरी हिंदी में नहीं है।*
कष्ट हुआ आज यह पढ़कर की अंग्रेजी के बड़े भाषाविद हिन्दू होकर भी *जय श्री राम* के नारे को हिंसात्मक बताते हैं।
बहरहाल समस्या यह नहीं है कि उनका अभिमत क्या है? समस्या यह है कि हमारा आचरण कैसा है?
Good Morning, Good night , hey buddy, guy, जैसे शब्द हमारी भाषा में नहीं थे। हमने इन्हें अपना हुनर बनाने की जगह पर अपनी आदत में शुमार कर लिया।
ध्यान रहे अंग्रेजी हम हिंदुस्तानियों का हुनर हो सकती है, मातृभाषा नहीं।
मैं वैज्ञानिकता सिद्ध करता हूँ इस बात की। इस तथ्य पर नजर करें कि अंग्रेजी की 1 से 999 तक कि गणना में अंग्रेजी का प्रथम अक्षर 'A' कहीं स्थान नहीं पाता... जबतक हज़ार अर्थात *thousAnd* तक न पहुंचे।
आप कितने भी विद्वान हो जाये घर जाकर गृहणी से यह नहीं कहेंगे.. plz give me rice and pulse. यह कहेंगे कि दाल चावल खाने की इच्छा है।
इसलिए साहित्य अध्ययन की दुनिया मे कदम रखने वाले हर छात्र से मेरा अनुरोध है कि अंग्रेजी पढ़िए, अंग्रेजी सीखिए किन्तु अंग्रेजी को जीना बन्द कीजिये।
उदाहरण आपके सामने, आपके महनीय सभी प्राध्यापक है, जो अंग्रेजी पढ़ाते भी हैं, लिखते भी हैं, बोलते भी हैं लेकिंन भोजपुरी से प्रेम नहीं छोड़ा।
औऱ भी कई उदाहरण हैं....
आपके संवहन की क्रिया केवल आपके अंदर के जीवन से सम्भव है, बाहर तो सम्मोहन है..मात्र सम्मोहन।
गुब्बारे के अंदर भरी हुई हवा के कारण ही वह ऊपर उड़ता है... अंदर की हवा निकल जाए तो बाहर कितनी ही आंधी चल जाये वह हवा में टिकेगा नहीं।
इसलिए आइये हिंदी की ओर लौटें...... भाषा-शैली औऱ भाषा के मध्यांतर को समझें।
शिक्षित बनें...साक्षर नहीं।
जय हिंदी! जय भारती!
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