बघेली-कविता 2
आज हवा का रुख गाँवों की और रहा, सोचा मै भी थोडा अपनी
बोली बोलूँ...
प्रस्तुत है एक कविता बघेली में-
प्रस्तुत है एक कविता बघेली में-
ख्यात बात से फुर्सत होइके, लगी नेक चौपाल।
कुछ त नेक विदूषक बैठे, बैठ बजामय गाल।।
एतने मा बड़कउना आये, कहिन सुनाबा भाई।
गाँव के लड़िका बड़े बड़े हैं, क्याखर ब्याह करायी।।
तुरत खेलामन झोरी ढूंढ़िन, नाम गिनाइन तीस।
आपन लड़िका नहीं बताइन, लगे निपोरँय खीस।।
तबहिन हाथ पकड़ झकझोरिस लड़िका लगा
सुनामय।
बाबू का तुम नही चहत्या मोरौ कजहा आमय।।
एतना सुनत खेलामन दादू होइगे आग बबूला।
भरी सभा मा कइसन बोलैं, बस नथुनै भर फूला।।
उतनेन मा मसखरी उड़ाईन बिरजू और बिहारी।
और खेलावन देख के लागैं जैसे भींज
बिलारी।।
मन मा केतने सपन रहे हैं,हमहूँ समधी बनबै।
और लड़िका के काजे मा हम रूपया अहिमक
धुनबै।।
अइसय तइसय सोचत सोचत एक पहर भा पार।
और दुसरे में दूर गाँव के कजहा पहुँचे
चार।।
जइसे बात चली काजे कय, सबका मन हरियान।
और खेलावन का अस लागय बस अब जइहैं
प्रान।।
काजे का दरबार लगा जब मुखिया नाम बताइन।
पहलेन नाम खेलावन का, फेर पाछे और गिनाइन।।
जब अब बात जोर कुछ पकडिस, कहिन सुना हो भाई।
थोड़ी लड़िका कय रूचि देखी और लड़िका कय
माई।।
चार ठे लड़िकन मा कजहन का एकय नीक देखान।
लड़िका रहो खेलावन का, और डेहरिउ चतुर
सुजान।।
जब दहेज़ कय बात चली त तुरत खेलावन बोले।
पांच लाख से कम न करिहौं, जप ल्या हर हर भोले।।
बड़ी देर मा सांस खीच के संख्या उतरी
चार।
पर अबहूँ कुछ गरुहर लागय, चींटी चढ़ै पहाड़।।
आखिर और झुलाये माहीं, खींच के बोलिन तीन।
कजहा सोचैं बिना तीन के कइसन बाजै बीन।।
तब तिकड़म कक्कू का सूझी,थोड़ी जोर खखारिन।
और खेलावन के काने मा दुई-दुई दा फुसकारिन।।
आख़िर सौदा तय तमान भा एक लाख के भीतर।
पर उतनेउ मा समधी के न देउता पामय
पीतर।।
पांच लाख का माला गावत चार गाँव माँ
बागे।
एक लाख मा सब तय होइगा,या कजहा के आगे।।
इतना सुनतय पांडे आपन झटपट पत्रा काढ़िन।
लग्न मुहूरत तय करके पुनि तुरतै हाँथ
पसारिन।।
अस तस करके गाये गाये करि आये बारात।
और खेलावन के झोली मा कुछू न आओ हाँथ।।
आख़िर बहू मिली घर ऊपर, तब मन भयो प्रसन्न।
तीन रात त भूखे जागिन, चौथे पाइन अन्न।।
तुरतै कान पकड़ प्रन कीन्हिन, अब न ल्याब दहेज़।
और गाँव के पंचायत से बहुतय करब परहेज़।।
✍विक्रम मिश्रा
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