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" है उदासी आज सूरज के नयन में,
औऱ धरती पर अंधेरा झूमता है।
जा रहा हूँ मैं तिलिस्मी दीप लेकर,
कोहरा मेरे बदन को चूमता है।
ओश मुझपर मोतियाँ बरसा रही है,
शीत है कि कर कुतरना चाहती है।
मैं अकिंचन धीरे- धीरे बढ़ रहा हूँ,
औऱ बयारें पर कतरना चाहती हैं।
रास्ते सुनसान बीहड़ बन गए हैं,
धुंध अंधाधुंध सब पर छा गयी है।
मैं अकेला बिन उजाले चल रहा हूँ
औऱ धरती मेरे हिस्से आ गयी है।
स्याह होकर दिन मुझे ललकारता है,
जुगनुओं ने मुझसे बावस्ता किया है।
रास्तों को भी किनारे ओट ऱखकर,
आज धरती ने मुझे रस्ता दिया है।"
वाह! वाह!
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