वही पर्दा गिराते हैं,वही पर्दा उठाते हैं..........(ग़ज़ल )


ग़ज़ल 

मयस्सर हर घड़ी इक दिल्लगी महसूस करता हूँ,
नजाकत से वो जब सजदे में मेरे सर झुकाते हैं।

कई दीदार जन्नत के करूं कुर्बान उस रुत पर,
जिधर मैं रुख करूं वो मरहबा सा पास आते हैं।

अधूरे चाँद में पूनम के वो कमख़ाब गढ़ते हैं,
वही पर्दा गिराते हैं,वही पर्दा उठाते हैं।

हंथेली में लगा मेंहन्दी, वो ख़ुश्बू इत्र की चाहें,
मैं जैसा बोल दूँ उस पल वो वैसा महक जाते हैं।

जमाना अपनी नजरों में नजर को मोल ले कितना,
मग़र जितनी मोहब्बत मैं कहूं वो तोल जाते हैं।

मेरे हर एक नग़मे को, मेरी हर इक इबादत को।
नज़र मैं क़ैद करते हैं मग़र दिल खोल जाते हैं।

कोई शिक़वा नही खुद से, खुदा से रंजिशें कैसी ...??
कलम का जोर है हम आज भी संग डोल जाते हैं।

@vikram_mishra

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