................यार जिंदगानी है...!





..........यार जिंदगानी है...!

भोर का सूरज,
उजाला रश्मियों के संग,
धरा की गोद में उल्लास का स्वर,
मेहरबानी है।
यार जिंदगानी है...!



हवा के संग,
ख़ुशबू इस जमी की,
हाल में हरहाल में अब,
खानदानी है,
यार जिंदगानी है..!


शहद सी नूरी,
घुले जिस रंग में,
अहा! तय है क़ि रंगत शाह की,
आनी ही आनी है,
यार जिंदगानी है..!


साथ रुतबा है,
जंग है, ख़िलाफ़त है,
अमाँ में शोर है चाहत,
वही पुरानी है,
यार जिंदगानी है!


जद्दोजहद हद में,
हलाहल के समन्दर में,
अकेले मथ अमरता , गरल से,
लानी ही लानी है,
यार जिंदगानी है..!


जरा अफ़सोस हो,
थाली में साग न आई,
पड़ोसी सो गया भूखा, नजऱ
पानी ही पानी है,
यार जिंदगानी है..!


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