आज का दौर भी हमारा था, आज की शाम भी हमारी है.... (ग़ज़ल )
ग़ज़ल
आज का दौर भी हमारा था,
आज की शाम भी हमारी है....
रात की आहटों ने कह डाला ,
चाँद को इश्क की बिमारी है....
बेबसी रह गयी लबों पर ही ,
आज हर आँख में खुद्दारी है ,...
साँझ ढलते ही चांदनी आयी ,
आज तारों में बेशुमारी है।
दूर से जख्म हरे देखे थे,
ख्वाब में आज बेकरारी है .....
आह थी,मैं तख्त हजारा था
, फिर वही रास की बहारी है
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