पनाहों में कितने छिपे दास्ताँ हैं, जरा मुड़ के देखो, किन्हें याद आई............(ग़ज़ल)
ग़ज़ल
पनाहों
में कितने छिपे दास्ताँ हैं,
जरा
मुड़ के देखो, किन्हें याद आई।।
महज़
कायनाती क़लम की अदा है,
कि
बेज़ान पन्नों में भी जान आई।।
अज़ब
बेबसी है, गज़ब है तराना,
खुदा
का करम है, वही शाम आई।।
अभी
चाँद को इक नजर भी न देखा,
धरी
की धरी रह गयी पारसाई।।
लिफ़ाफ़े
बताते रहे हैं संदेशे,
उन्हें
खोलने की न सौगात आई।।
कई
मर्तबा गौर से हमने देखा,
न
तो धूप बरसी, न बरसात आई।।
सुबह
की घड़ी थी, घड़ी दो घड़ी भर,
जो
तुम देख लेते, न होती जुदाई।।
मेरी
ज़ुस्तजू में महज़ आशिक़ी थी,
न
नजरें मिलाते, न मिलती दुहाई।।
बड़ी
दूर देखा था इक आशियाना,
मग़र
रेत में अब न देता दिखाई।।
जहाँ
से चले थे, वहीं आ खड़े हैं,
न
घर याद आया, न वो चारपाई।।
अग़र
साथ चलते तो सब साथ होता,
ये
घरबार, आँगन, ये मंजिल- वफ़ाई।।
कई
ख़त लिखे थे तुम्हारे लिए पर,
न
तुम पढ़ सके, ना हमें आंच आई।।
जली
एक पल में ये दौलत-गृहस्थी,
न
जाने क़ि ये आग किसने लगाई।।
न
महफूज़ थे तुम, न महफूज़ थे हम,
जिधर
रुख किया बस दिखी बेवफ़ाई।।
तो
देखे पुराने लिखे ख़त तुम्हारे,
क़ि
तकिये के नीचे आवाज़ आई।।
इधऱ
गम के बादल उड़ा दे धुँए में,
मोहब्बत
है, इसमें न चलती सफाई।।
बड़े
गौर से एक नज़र भर के देखा,
तो
फिर एक सूरत उभर मुस्कुराई।।
मिली
आस दिल को क़ि यह भी सही,
पर
वो बेजान निकला,
नहीं
जान पायी।।
उसे
क्या पता था ये मज़हब लुटेरा,
कहाँ
छीन ले उम्र भर की कमाई।।
जहाँ
थी वही पर गिरी इस कदर,
ढ़ेर
बनकर जनाज़े में भी न समायी।।
अग़र
ख्वाहिशें यह हुकूमत न करती,
तो
मन्दिर से मस्जिद की होती सगाई।।
#vk_poetry
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