कायल नही थे हम किसी अलमस्त राह के, जुल्फों ने गुल खिला के वफ़ादार कर दिया.......(ग़ज़ल)


ग़ज़ल

कायल नही थे हम किसी अलमस्त राह के,
जुल्फों ने गुल खिला के वफ़ादार कर दिया।

यह शाम क्या ढली किसी बस्ती के रंग में,
रंगरेज़ निगाहों ने गुनहगार कर दिया।।

इस अहले पहल ने कोई मौसम नही देखा,
बस शोख नज़र ने तेरी यलगार कर दिया।।

दीवार , ये आँगन , तेरी दहलीज़ , बगीचा,
सब छोड़ एक गली को ही घर-बार कर दिया।।

इक ख़्वाब संजोता हुआ नग़मा पढ़ा तो क्या,
उसने तो मुलाकात को दरबार कर दिया ।।

हर हाल में जीने क़ी तमन्ना हुई ज़ाहिल,
किसने मेरे ख़त को यहाँ अख़बार कर दिया.??

क्या ख़ूब बिखेरा गया है बज्म को तेरी,
तन्हाइयों के जाल ने व्यापार कर दिया।।

घर-बार गली खेत मोहल्ले नहीं देखे,
इस इश्क़ ने रुसवा तुझे हर बार कर दिया।।

चल संग मेरे दूर बसाते हैं नया घर,
इस दौर ने जीना मेरा दुस्वार कर दिया।।

इस दौर में ये इश्क़ मोहब्बत नही चलती,
कागज़ के दो पन्नों ने ये साकार कर दिया।।

उल्फ़त के सितारों को कोई थाम ले कैसे,
मुद्दत की तमन्ना ने ये इकरार कर दिया।।

#vk_poetry


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