तकिये तले फिर खत वो पुराने देखे............(ग़ज़ल)
गुज़रे साल की अच्छी यादें
जाने
किस ओर हवाओं ने चलाया जादू,
जाने
कैसे इन निगाहों ने अनोखा देखा।
आज
फिर कैद हुई बज़्म इस जमाने की,
आज
अख़बार में यादों का झरोखा देखा।।
हो
के मायूस अध ठगी से इन निगाहों ने,
भरे
सैलाब में बचपन के ज़माने देखे।
साल-दर-साल
उम्र शौक से चढ़ते देखी,
आज
फिर गौर से वो खेल पुराने देखे।।
देके
आवाज घर के सामने मुंडेरों से,
सांकलें
खोल के आते से सयाने देखे।
बड़ी
शिद्दत से जो मिलती थी दो पल की मोहलत,
आज
दीवार में बचने के बहाने देखे।।
कभी
रुतबे में मचलता हुआ वह याराना,
कभी
बेख़ौफ़ जवानी के नजारे देखे।
कभी
मदहोश बगीचों को महकते देखा,
आज
भँवरे भी खुशबुओं के ही मारे देखे।।
मरहबा
नींद में ख्वाबों को पनपते देखा,
ख्वाब
में साल गुजरने के तराने देखे।
आज
महबूब की आँखों की चमक रंग लाई,
आज
तकिये तले फिर खत वो पुराने देखे।
लेखक
-
विक्रम
मिश्रा
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