क्या कुर्बान करूँ मैं तुझे पाने के लिए............?
ऐ
आसमानी परिंदे,
मेरी यह टेर सुन,
जमीं
पे उतर, छाँव ले, आ बैठ।
मेरी
गोद सूनी है,
तुझे
सहलाने के लिए।
मेरे
भीतर एक प्रेम अभी जिन्दा है,
काश तू देख सके,
गौर
से देख,
जिस्मानी दौर है यार।
अब एक तू ही
तो बचा है
आजमाने के
लिए।।
अरसे
गुजर गये इस हाल में,
रेत के बादलों ने खूब प्यासा कर दिया।
मिट
गयीं कलियाँ,
अधखिली सी, अधभरी सी, बागानों में।
कोई काबिल
नही तेरे शिवाय,
मेरे प्रेम
को पाने के लिए।
नाम
क्या दूँ इस जहाँ को,
इसके प्रेम को???
प्रेम
है या सौदागरी है रूप की??
तू
कहे तो कूद जाऊं मैं भी इस दोजख में,
पर
अफ़सोस कुछ बचा नही मेरे हिस्से का।
यार तू ही
बता?
क्या कुर्बान करूँ मैं
तुझे पाने के लिए?
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विक्रम
मिश्रा 'वीर'
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