हकदार नहीं तुम कहलाये कहलाकर भी, इल्जाम लगाना भी सम्मान हुआ यारो...........(ग़ज़ल )
ग़ज़ल
हकदार
नहीं तुम कहलाये कहलाकर भी,
इल्जाम
लगाना भी सम्मान हुआ यारो।
यह
अलख जगाते मेरे अफ़साने नगमे,
घर
बार बसाना भी गुमनाम हुआ यारो।
दीवारों
पर छिप बाट जोहना साथी की,
खत
पर लिखना भी इक इल्जाम हुआ यारो।
पट
खोल हवा से बातें करने की आदत,
सपनों
में उसका स्वर, पैगाम हुआ यारो।
दिन
भोर साँझ दोपहरी रात घनेरी हो,
अब
एक आग में तपना तक आसान हुआ यारो।
इक
तीर सलीके एक राह का सूनापन,
चुभना, और आह निकलना तक अनजान हुआ यारो।
क्या
ख़ाक करूँ कुर्बान तुम्हारे दामन में इक रुत ख़ातिर,
हर
रोज सुबह उठकर मरना इतना आसान नहीं यारो।।
कागज़
के पन्नों का भरना भी स्याही से,
आख़िर
इक हद में वह भी जान हुआ यारो।
चितवन
चिंता के वन में भी स्वच्छ्न्द नहीं,
घुटकर
मरना भी अपमान हुआ यारो।
इक
अलग राग में माझी की बंसी मल्हार,
इक
अलग राग में विरहा शान हुआ यारो।
अधरों
के अधरावन की हर सूखी क्यारी,
मैं
जिन्दा हूँ पर मन बेजान हुआ यारो।
पर
नज़र खोजती अपनी जोड़ी-परछाईं,
अब
मरकर जीना भी आसान हुआ यारो।
#vk_poetry
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