इबारत बहुत कुछ बयाँ कर रही थी। मग़र नाम मेरा-तुम्हारा नहीं है .........(ग़ज़ल )
ग़ज़ल
कहो
कैसे आना हुआ इस गली में।
अभी
तुम वही हो,अभी हम वही हैं।।
न
ये साल बदला, न तारीख़ बदली।
अज़ब
है क़ि साथी पुराना नही है।।
कहूँ
किस अदब से नवाज़िश करूँ मैं,
बिना
झूठ बोले गुजारा नही है।
ये
पहली दफ़ा है वफ़ा का तकाज़ा।
जफ़ा
तो कभी भी गंवारा नही है।
अलग
दौर था जब निगाहें मिली थीं।
अभी
रूह पर हक तुम्हारा नहीं है।
वो
सावन के मौसम, अमावस की रातें।
जमाने
में थीं, अब जमाना नहीं है।
नहीं
देखना तुम पलटकर कभी अब।
वो
टूटा मकाँ भी हमारा नहीं है।।
नई
ईद में तुम नया चाँद देखो।
हमे
तो मयस्सर पुराना नही है।।
इबारत
बहुत कुछ बयाँ कर रही थी।
मग़र
नाम मेरा-तुम्हारा नहीं है।।
#vk_poetry
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