जरा पूछ लो क़ि रास्ते तुम भी इस कदर तो न जफ़ा करोगे............ (ग़ज़ल)


ग़ज़ल

इन हाथों में चन्द लकीरें, जीवन भर का ताना-बाना,
मुठ्ठी भर की इस बस्ती में, किसको किसको दफ़ा करोगे??

जिधर हवा का मिजाज़ होगा, उधर निगाहें बुलन्द होंगी,
तो काफिलों क़े क़रीब रहकर,यूँ किससे-किससे वफ़ा करोगे??

अग़र सवाली ये महफिलें भी लगी पलटनें पुराने पन्ने,
तो दफ्तरों के हुजूम में तुम न जाने किस पर खफ़ा करोगे??

वो रेत पर जो लिखा गया है, खुदा-नवाज़ी से कम नही है,
जो मिट गया तो मिटेगी हस्ती, ये दाग कैसे सफ़ा करोगे??

लिखी इबारत में जो इबादत छिपी हुई खुदा के घर से,
वही मोहब्बत का राज है, तुम न जाने कितने दफ़ा करोगे??

ये रीत उल्फ़त तबादलों की नहीं मिटी है, नही मिटेगी,
तो एक रहकर भी तुम अकेले यूँ कब तलक यह नफ़ा करोगे??

जब इस जमाने ने रंग बदला, तो काफिरों ने करी नुमाइश।
जरा पूछ लो क़ि रास्ते तुम भी इस कदर तो न जफ़ा करोगे।

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