बघेली-कविता 1
लोगों के बात व्यवहार से जो अनुभव हुआ उसे बघेली में परिणित
करने की कोशिश करता हूँ....
आसौं फुलवा कय बटनवा कइसन दबरी?
बीते दिनवा के सूरतिया अइसन
तपरी।।
एक एक नेता रोज़ दुआरे, मजमा ख़ूब
लगामय,
राम करैं उनके वोटवा मा नोटा जी
लग जावंय।।
आसौं है पंजा कय बारी, फुलवा कइसन दबरी।
गुजरे दिनवा कय सूरतिया कइसन
बिसरी।।
कहैं खेलावन सुना परोसी, तुमही बात
बताई।
आरक्षण मा अइसन लागै अब न मिली
लुगाई।
( अरे भाई ! जब नौकरी ही न मिलेगी
तो कहाँ से कोई अपनी बिटिया ब्याहेगा,किसी
बेरोजगार लड़के से।)
एसे आबा हाँथ मिलायी, तबहिन् होई
सफरी।
आसौं फुलवा कय बटनवा कइसन दबरी?
बीते दिनवा के सूरतिया अइसन
तपरी।।
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