सामान्य-परिचय
लेखक की कलम से................✎

समस्त स्नेहिल पाठकगणों !
सादर नमन !
मैं अकिंचन किसी विधा-विशेष का मार्मिक ज्ञाता तो नहीं हूँ किन्तु मातृभाषा के प्रति अनन्य अनुराग एवं निष्ठावश यदा-कदा अपनी तुकवंदियों को नया आयाम देने का प्रयास करता रहा हूँ।
अपने विद्यार्थी जीवन के दिनों से ही यह कार्य कभी नियमित तो कभी अनियमित रूप से अनवरत आज तक चलता रहा है, ईश्वर की अनुकंपा होगी तो आगे भी चलता रहेगा.........
मैंने लेखन के इस शौक को मूर्त रूप देने का विचार कभी नहीं किया , कुछ आर्थिक अव्यवस्थाओं के चलते इनके प्रकाशन का ख्याल भी नहीं आया, और इसी के सिलसिले मे संकलन का भी खयाल , एक खयाल ही रह गया।
आप सोच रहे होंगे यदि संकलित नहीं किया तो इतनी सारी रचनाएँ कैसे हुईं ?
उसका जवाब मैं दे रहा हूँ किन्तु उसके पहले यह जाहिर कर दूँ कि इनमे से कोई भी रचना कागज-कलम से नहीं लिखी गयी , मैं अपनी वैचारिक खानाबदोशी को अपने ज़िंदगी के अनुभवों मे पिरोता हुआ जब जहां मौका मिला अपनी फेसबुक पर सीधे लिख देता था, खुशामद की दो चार टिप्पणियाँ मिल जाती थीं और मेरे अंदर का लेखक उफान पर हो जाता था ... और बढ़ते दौर मे दो चार पंक्तियाँ और नसीब हो जाती थीं।
खैर मैं ठहरा एक मौसमी बादल , और मौसम का क्या ठिकाना , इसलिए प्रशंसा की मंशा से नहीं अपितु स्वांतःसुखाय और अपनी आगामी पीढ़ियों के लिए हिन्दी के प्रति ललक जगाने के उद्देश्य से मैंने प्रेम सहित अन्य विषयों पर अपना हांथ आजमाया।
इस सबसे इतर मैंने अपनी बघेली का साथ कभी नही छोड़ा।
इन रचनाओं पर बेशक मेरा अधिकार है , किन्तु उतना ही अधिकार आपका भी है। पाठक के बिना लेखक का क्या महत्व ?
बस इसकी गरिमा बनाए रखना आप सबका कर्तव्य है ताकि भविष्य की कलम के भीतर की स्याही सूखकर न रह जाए , उसका पल्लवन हो , एक नया आयाम मिले , और वहाँ पहुंचे जहां मैं (पूरा लेखक एवं कवि संसार ) पहुँचना चाहता हूँ ।
चंद पंक्तियाँ अपने परिचय के रूप मे आप सबको सादर समर्पित .....
"मेरे इश्क़ में
माटी की खुशबू , और मेरी तह पाना।
ख़ाली हूँ या भरा हुआ हूँ, बड़ा कठिन है कह पाना।"
#वीर
ख़ाली हूँ या भरा हुआ हूँ, बड़ा कठिन है कह पाना।"
#वीर
विक्रम मिश्रा 'वीर'
अद्वितीय मित्र ।
ReplyDeleteसादर आभार मित्र!
ReplyDeleteStunning writing
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